साहित्य/भाषा/कला/बहुभाषिक सिर्जना (गजल/हाइकु/मुक्तक/कविता)

  • उर्दु मुक्तक
    अशफाक ताबिश संघर्ष
    २०६८ मंसिर २५ गते आइतवार December 11, 2011

    उर्दु मुक्तक
    उदासी क्यों मे छाई है उदासीका सब्ब क्या है ।
    तेरी महेफिल में साकी क्यों नही सागर छलकते है ।।
    जिन्हें एहसास त होता नहीं अपने गुनाहों का ।
    उन्ही के बच्चेबच्चे दानेदाने को तरस्ते है ।।
    (१)
    मुझको हसिन ख्वाब दिखाते हैं आजकल ।
    मेरी मुसीबतों को बढाते है आजकल ।।
    ताबिश ये पुछकर हयें शर्मिदा मत करों ।
    अपने ही लोग आग लगाते हैं आजकल ।।
    (२)
    नजर से अपनी वो गिरने लगा है ।
    जमाने से भी अब डरने लगा है ।।
    बहुत ही नाज था महलों पे जिसको ।
    वो अब फुटपाथ पर सोने लगा है ।।
    (३)
    सोचता हुँ मै हमेशा यही तन्हाई मै ।
    नाम तेरा भी हैं शामिल मेरी रुसवाई मैं ।।
    तेरी तस्वीर मेरी आँखो से ओझल क्या हुई ।
    ढुँढता हुँ मैं तुझे आखो की गहराई मैं ।।
    (४)
    जो कभी हाल था वो हाल नहीं ।
    जख्मे दिल का कोई सवाल नहीं ।।
    मुझको अपनो ने लुटा हैं ताबिश ।
    फिर भी मुझको कोई मलाल नहीं ।।
    ०००
    (गजलकार गजल प्रतिष्ठानका उपाध्यक्ष हुन्)





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